BP accounting in depth COMPANY ACCOUNTS

COMPANY ACCOUNTS

COMPANY ACCOUNTS — a Bank Promotions accounting in depth video lecture on Learning Sessions.

14 Jun 2026 57:45 min 11 views
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तो start करते हैं, सबसे पहले हम यहाँ पर company का meaning समझते हैं, कि company क्या होता है, तो देखो जब भी हम business करते हैं, तो business करने के कई तरीके होते हैं, एक तो तरीका होता है कि हम खुद से business करें, जितना भी पैसा हो business में हम खुद लगाएं, उससे जो भी profit हो, सारा हमें मिले, और जित किसी दूसरे person के साथ में मिलकर उस business को start करो, तो इस form of organization हम क्या कहते हैं, partnership form, जिसमें एक से ज़ादा persons मिलकर किसी business को run करते हैं, उससे तरीके से एक और तरीका होता है कि हम एक company बना ले और उससे अपना business करें, तो company भी एक business करने की ही organization होती है, business करने का ही तरीका होता है, � ताकि हम business यहाँ पर कर पाए, अब यह company basically होती क्या है, क्या features हैं, उनके बारे में हम देखते हैं, तो यहाँ पर देखो, company is an artificial person created by law and entirely distinct from its members, इस line का मतलब क्या हुआ, तो इसको एक example के साथ आपको समझाओंगा, तो यहाँ पर देखो, एक person A है, जिसने car बना के market में sale करना � 2013 के under register करवा लिया, तो register होने के साथ यह company क्या बन गई, एक person बन गई, ठीक है, एक अलग person बन गई, law की नज़र में यह क्या है, एक person है, क्योंकि यह natural person नहीं है, human नहीं है, natural human being नहीं है, तो इसको हम यहाँ पर क्या कहते है, artificial person, ठीक है, क्या पर कहते हम इसको, artificial person, और इसक company के member है, यानि कि owner, जिसने यहाँ पर business को start किया था, वो उससे अलग है, law की नज़र में, यह जो a person है, जिसने इस business को start किया है, वो दोनों ही अलग-अलग persons है, clear आपको, clear है, और यहाँ पर देखो, is capable of owing, enjoying and disposing of property in its own name, ठीक है, अब जैसे कोई normal human being होता है, वो अपने नाम किसी भी property को खरीज सकती है, किसी भी property को बेश सकती है, अपना business perform कर सकती है, clear आपको, clear है, यह हमारी definition की company की, तो यहाँ पर एक चीज़ आपको clear हो गई होगी, कि यह जो a person owner है, और यह जो company है, दो separate entity है law की नज़र में, अब जो भी business किया जाएगा, जैसे अगर यह a limited business करत है, फटबट से हम इसके features भी कर लेते हैं, तो यहाँ पर देखो features of a company, अब एक company के कौन-कौन से यहाँ पर features होते हैं, उनके बारे में हम यहाँ पर पढ़ लेते हैं, पहला feature क्या है, incorporated association, इसका मतलब है कि जो company होती है, हमेशा incorporated होती, जैसे आपने कोई company बनाई है, आपको � करवाना ही पड़ेगा, अब मैं companies act 2013 क्यों कह रहा हूँ, कि इंडिया में जो companies है, उसको regular कौन करता है, हमारा companies act 2013, ठीक है, तो company हमेशा एक incorporated association होती है, companies act के अंडर, ठीक है, next point देखो कहे, separate legal entity, separate legal entity का मतलब, कि जो company है और उसका जो owner है, वो दोनों ही अलग-अलग entity है, अगर clear है, अब देखो यहाँ पर, यहाँ पर एक person, अब यह जो separate legal entity है, इसका role क्या होता है, इसका benefit क्या होता है, तो यहाँ पर देखो जो A person है, ठीक है, A person है, उसने यहाँ पर business start कर दिया, A limited, ठीक है, तो law की नज़र में यह क्या है, कि separate legal entity है, और हमें इस business की accounting भी इसी point of view से क लगा दिया, clear है, अब देखो क्या होगा, next, अब यह जो person, company है, A limited, यह जो 50 लाग रुपी ए परसन ने दिया, A limited के लिए क्या बन जाएगी, एक liability बन जाएगी, liability का मतलब, जैसे करजा होता है ना, जैसे हम normally जब बात करते हैं, कि एक person दूसरे person को जब पैसा देता है, तो पैसा उसको यहाँ पर वापस करना है, अगर यह separate legal entity का concept ना हो, तो यहाँ पर जो पैसा invest किया है, A person ने invest किया है, उसको अलग से liability शो करने की ज़रूरत नहीं है, तो इसलिए company हमेशा separate legal entity मानी जाती है, और उसके according ही accounting की जाती है, next point देखो क्या है, perpetual succession, अब इसका मतलब क्य भी effect नहीं पड़ता, कहने का मतलब है, कि अगर कोई यहाँ पर business का owner था, मान ले यहाँ पर A person था, जिसने यहाँ पर A limited company को यहाँ पर start किया था, तो यहाँ पर देखो, यह जो owner है, अगर वो change होके B बन जाता है, यहाँ पर A person की यहाँ पर death हो जाती है, उसके बाद उसका अगर A person जो insolvent हो जाता है, insolvent का मतलब अब उसके पास इतने पैसे नहीं है कि वो business आगे कर पाए, investment करने के उसके पास पैसे नहीं है, या फिर A person की death हो जाती है, तो इस case में, मान ले यहाँ D नया owner आ जाता है, तो इसका company के उपर किसी भी तरह का effect नहीं पड़ेगा, company forever � का, जो कि हमारी partnership form जो होती है, उसमें यह feature available नहीं होता, इसलिए company इस feature की वज़े से अच्छी है, clear है आपको, next एक हो क्या है, common seal, अब common seal क्या होता है, जिससे हम normal human being है, हम कहीं पे भी कोई contract करते हैं, कहीं पे भी कोई account खुलवाते हैं, तो हम वहाँ पे यहाँ करते हैं, अ वो use करते है, common seal, ठीक है, हर एक company के एक मोहर होती है, ठीक है, आप लोगों को पता है, एक trademark होता है, एक मोहर होती है, तो company जब भी कोई contract करती है, कोई भी चीज परचेस करती है, तो वहाँ पर company का common seal चलता है, वो होना जरूरी है, ठीक है, जैसे हमारा sign होना जरूरी नहीं ह वैलिड नहीं माना जाता है, हर कंपनी के एक common seal होती है, उसकी stamp होती है, उसकी moher होती है, next एक हो क्या है, limited liability, सबसे बड़ा जो benefit है कंपनी का, वो कहे limited liability, partnership form में ये feature नहीं available है, अब limited liability का मतलब क्या होता है, तो जो company के owners है, जो company में पैसा लगाते हैं, जो company के members हैं, उनकी liability क्या होती है, limited होती है, यानि कि, अगर यहाँ पर मालो एक person A है, उसने यहाँ पर company के, मालो company में जो है, company के 50 shares यहाँ पर खरीदे हैं, और एक company की जो value हो कितनी है, 10 लाग, ठीक है, एक company का जो price हो कितना है, 10 रुपीज है, 100 कर लेते हैं, ठीक है, तो यहाँ पर देखो, यह जो A person है, उसकी liability है, सिर्फ और सिर्फ, 5000 रुपीज पेख लेगी company को, company इससे ज़्यादा, इस person से जो है, पैसे नहीं ले सकती, ठीक है, तो इसमें क्या होता है, company के जो members होते हैं, उनकी liability क्या होती है, limited होती है, जितना उन्होंने shares खरीदे होते हैं, company सिर्फ और सिर्फ उसी की value, जितना पैसा, owner से मंगवा सकती है, उससे ज़्यादा नहीं मंगवा सकती है, अगर company डूपती है, तो इस case में A person एक भी रुपे यहाँ पर नहीं देगा, company इसको legally नहीं force कर सकती, कि आप ज़्यादा पैसा हमें pay करो, इसको हम क्या कहते हैं, यहाँ पर limited liability, यह starting में ही fix कर दी जाती है, जब company अपने shares बेच रही होती है, तो अगर कोई person starting में ही जितने shares खरीदेगा, वहीं पर उसकी liability fix हो जाती है, उससे ज़्यादा वह payment नहीं करेगा, next एक वो कहा है, transferability of shares, अब जो company के shares है, वो easily transferable है, एक इसकी वो होती है, exception होती है, जैसे कि private limited company है, तो उस case में easily transferable नहीं होता है, पर normal case में, जो public limited company है, उसमें जो company के shares है, वो easily transferable होते हैं, जब कोई person यहाँ पर company का shares buy करता है, तो वो company का क्या बन जाता है, member बन जाता है, owner बन जाता है, और उसका जब मन चाहे, वो जो है अपने shares को, किसी दूसरे person को easily transfer कर सकता है, बिना किसी दूसरे owner की consent लिए, मान में यहाँ पर एक person A है, जिसके पास यहाँ पर 50 shares थे company के, ठीक है, और यहाँ पर एक B भी है, एक C भी है, ठीक है, यहाँ पर तीन हमारे और यहाँ पर owners हैं, जिन्होंने shares buy किये, तो A person बिना इनकी consent के, बिना इनको बताए, यह जो 50 shares है, वो यहाँ पर किसी person E को transfer easily कर सकता है, ठीक है, next एको क्या है, separation of management from ownership, separation from management from ownership, इसका मतलब क्या हुआ, कि जो company की management है, और जो company की owner है, वो दो अलग-अलग है, ठीक है, अगर यहाँ पर देखो, A limited company है, ठीक है, यहाँ पर A limited company है, और A इसका owner है, तो यहाँ पर देखो, company की जो management है, जो company का working करेगा, वो अलग persons appoint किये जाएंगे, ठीक है, और यह दोनों अलग होंगे, ठीक है, law की नजर में, यह जो A person है, और यह जो, इसका जो management, management का मतलब होता है, company को जो लोग manage करते हैं, जो company कैसे काम करेगी, किस तरीके से करेगी, क्या policies बनानी है, वो हमारी क्या होती है, management होती है, तो owner और management, दो अलग अलग यहाँ पर persons होते हैं, इनको एक नहीं माना जाता, owner तो है, यह तो पता है कि company के owner है, पर उसके लिए management अलग होती है, वो काम अलग होती है, इन owners का control होता है, management पर, यह owners जो है voting right कर सकते हैं, पर ultimately, जो company को manage करते हैं, वो अलग person appoint के जाते हैं, जैसे कि director विकेरा, clear है आपको, clear है, यह हमारे कुछ features थे, company के, तो फटाफट से एक बार मुझे chat box में बता दिए, क्या आपको features clear है, फटाफट से मुझे एक बारी chat box में बता दिए, क्या आपको features clear है, बहुत important है हमारे points, फटाफट से एक बारी chat box में बता दिए, next point देखो हमारा क्या है यहाँ पर, difference between partnership firm और a company, अब क्योंकि हमने company के बारे में detail में पढ़ लिया है, कि company क्या होती है, उसके कौन-कौन features होते हैं, अब हमें differentiate करना है, partnership firm और company के बीच में, हर organization के, जैसे sole proprietorship है, partnership firm है, या फिर company है, उनके अलग-अलग features होते हैं, उनके अलग-अलग benefits होते हैं, अलग-अलग उनके नुकसान होते हैं, तो उसके हिसाब से हम यहाँ पर, अपने हिसाब से, जो भी हमको suitable होता है, हम उस तरीके से business करते हैं, तो यहाँ पर एक partnership firm और company में, क्या difference होता है, वो हम यहाँ पर points देखेंगे, तो सबसे पहले देखो यहाँ पर act, ठीक है, जो इंडिया में, जो partnership form होती है, वो किसके according काम करती है, partnership act 1932 के according, partnership form कैसे काम करेगी, कैसे बनाए जाएंगे, उससे related कौन से rules and regulations है, वो कहाँ पर लिखे हुए है, partnership act 1932, clear है, next, जो हमारी company है, वो किस act के अंदर होती है, companies act 2013, company कैसे work करेगी, कैसे register करेगी, कितने उसके members होंगे, कितना वो maximum share capital raise कर पाएंगे, यह सब चीज़े कहां लिखे हुए है, companies act 2013, ठीक है, next एक हो क्या है, formation, जो partnership form की formation है, वो easy होती है, दो person आपस में मिले, उन्होंने एक mutual agreement किया, और वो easily यहाँ पर partnership form को create कर सकते हैं, ठीक है, बहुत easy होता है, आपस में कहीं register करवानी की इनको ज़रूरत नहीं होती है, पर जो company, अगर आपने company बनानी है, तो उसके लिए आपको कई सारे legal requirements, legal formalities पूरी करनी पड़ेगी, जिसे मैंने आपको starting में कहा था, कि company, तब ते company नहीं बनती, जब तक आप उसको companies act के under register नहीं करवाते, registration करवाते वक्ती, बहुत सारी आपर formalities की जाती है, next देखो गया registration, registration of a partnership form is not compulsory, जो partnership form है, उनको partnership act के under register कराना compulsory नहीं होता, अगर उनकी मरजी है, तो वो खुश से voluntarily registration करवा सकते है, otherwise उनके ऊपर कोई भी foundation नहीं होते, कि उनको registration करवानी ही है, पर, जो company के case में, जो registration है, वो क्या है, compulsory है, company को registration करवानी ही पड़ेगी, उसके अगर देखो, liability of a partner of a form is unlimited, जो partnership form है, उसके जो partners हैं, तो यहाँ पर एक A और B partner थे, जिन्नों ने मिलके यहाँ पर business को start किया था, तो यह जो A, B partners हैं, इनकी जो liability है, वो क्या है, unlimited है, unlimited का मतलब क्या हुआ, कि अगर partnership form ने कोई debt वगर लिया है, उसकी उसको payment करनी है, तो वो जब चाहे इन दोनों partner से पैसा मंगवा सकते हैं, सबसे बड़ी limitation partnership form की यही है, कि unlimited partnership, अगर यहाँ पर दोनों ने मिलके काम किया, मालो, यहाँ पर company जो partnership form है, उसको यहाँ पर 50 लाख का loan देना है, तो यहाँ पर company जो है, इन दोनों person से वो 50 लाख रुपे जो है, रिकवर करेगी, और partnership form, उनको payment करनी ही पड़ेगी, चाहे इनका घर भी जाया, कुछ भी हो, पूरा end तक, जब तक यह bankrupt नहीं हो जाते, इसके पैसे खतम नहीं हो जाते, partnership form इनसे पैसे लेते रहेगी, ताकि वो अपने debt को payment कर पाए, पर companies के case में ऐसा नहीं होता, companies के case में, जो यहाँ पर liability होती है, वो limited होती है, उसके बाद देखो, management in partnership form, ownership and management rest with the partners, मतलब कि partnership form के owner भी partners होते हैं, और उसको manage भी कौन करते हैं, partners करते हैं, दोनों एक ही होते हैं, इसका मतलब मैं आपको बता दू, कि partnership form और जो partners होते हैं, उनको हम एक ही मानते हैं, उनको law की नजर में वो दोनों एक ही हैं, clear है आपको, पर company के case में क्या है, separation है, ownership और management अलग-अलग चीज़े हैं, owner अलग है, company अलग है, उसके बाद देखो क्या है, perpetual existence, अब जो partnership form है, उसमें perpetual existence एक्जिस्ट नहीं गरती, जो हमने perpetual succession का point पढ़ा था यहाँ पर, वो partnership form में एक्जिस्ट नहीं गरती, इसका मतलब क्या है, कि अगर कोई partnership form में किसी partner की by-sales मान लो death हो जाती, मान लो यहाँ पर A partner था, B partner था, इसमें से मान लो CB partner था, अगर A person की यहाँ पर जो है, death हो जाती है किसी case में, तो यहाँ पर, यहाँ पर जो हमारी partnership form है, वो dissolve हो जागी, यानि कि बंद हो जागी, अब इनको नया, एक नया agreement बनाना पड़ेगा, और नए series एक partnership form जो है, form करनी पड़ेगी, clear है आपको, clear है, तो यहाँ पर partner की death होने पर, change होने पर, dissolve, और installment होने पर, जो partnership form है, form है, उस पर effect पड़ता, और नए series एक agreement बनाना पड़ता है, partnership form का, पर company के case में ऐसा नहीं है, owner आये जाये, company को पर कोई फर्क नहीं पड़ता, उसको कुछ भी करने की ज़रूरत नहीं होती है, वो अपना चलती ही रहती है, next एक वेट, transferability, a share in the partnership, cannot be transferred, without the consent of the other partner, जो हमारा partnership form है, जैसे यह तीन partners थे ना हमारे, अगर इस एक partner का मन बनता है, कि उसे अब यह partnership form छोड़नी है, और इसने अपना जो share है, इसमें जो business का इसका हिस्सा था, वो person D को transfer करना जाता है, तो बिना B और C की consent से, A person इसको transfer नहीं कर सकता, इन दोनों की consent लगेगी ही लगेगी, पर company के case में ऐसा नहीं होता है, बिना consent के भी यहाँ पर transfer कर दिया जाता है, clear है आपको, clear है, यह हमारे कुछ basic difference है, जिसके base पे हम partnership form, और company में differentiate कर सकते हैं, तो फटापट से एक बारी में chat box में बता दिजे, क्या आपको यहाँ तक clear है, एक बारी chat box में बता दिजे, क्या आपको यहाँ तक clear है, next देखो क्या है, types of company, अब यह company कितनी तरह की होती है, उनकी types हम यहाँ पर देखेंगे, एक एक करके, तो पहले देखो क्या है, on the basis of incorporation, company कैसे incorporate हुई है, कैसे registered हुई है, उसके base पे, हम company को कैसे यहाँ पर differentiate कर सकते हैं, वो हम यहाँ पर पढ़ेंगे, तो इसके base पे, जो पहली हमारी company होती है, वो क्या है, statutory company, अब statutory company क्या होती है, कोई भी ऐसी company, जिसको बनाने के लिए, जिसको incorporate करने के लिए, कोई special act पास किया गया हो, उसे हम यहाँ पर statutory company, और यह जो company है, उस act में, जो भी provisions लेखे होगे, rules and regulations होगे, उनको follow करके, अपना काम जो है, perform करेगी, जैसे example के लिए, मैं आपको बता दू, RBI, reserve bank of India जो है, वो क्या है, एक हमारी statutory company के example है, क्योंकि इसको बनाने के लिए, हमारा reserve bank of India act 1934, उसको पास किया गया था, और RBI जो company है, जो RBI है, वो काम कैसे करेगी, वो सारे rules and regulations, वो RBI के act में ही लिखे होते, clear आपको, clear है हमारी statutory company, next एक हो, registered company, registered company का मतलब है, कोई भी ऐसी company, जो की companies act 2013 के under registered की गई है, उसे हम यहाँ पर क्या कहते है, registered company, कोई भी normal company हो, अगर वो companies act 2013 के under registered है, तो उसे हम क्या कहते है, registered company, next एक हो, foreign company, कोई भी ऐसी company, जो की India के इलाबा, अगर हम India के point of view से सुचे, India के इलाबा, किसी दूसरी country में incorporate होई है, वो किसी दूसरी company के law के under registered है, पर उसकी जो branch है, वो India में है, तो उसे हम क्या कहते है, foreign company, जैसे Coca-Cola company होगी, McDonald's हो गए, वो सारे क्या है, हमारे foreign company है, यह basis था, incorporation पर, जब हम देखते हैं, कि company की incorporate कैसी हुई है, उसके base पर हम different करते हैं, next point हमारा देखो क्या है, on the basis of ownership, अब उसके owners कैसे हैं, किसके पास उनकी ownership है, उसके base पर हम company को कैसे divide कर सकते हैं, तो उसके base पर जो हमारी पहली company होती है, वो क्या होती है, private company, अब यह private company क्या होती है, तो यहाँ पर देखो, कि private company को बनाने के लिए, आपको minimum 2 members चाहिए, और maximum 200, मतलब कि private company में, अगर आपको private company बनानी है, तो उस case में, कम से कम आपको 2 members चाहिए, और ज़्यादा से ज़्यादा उसमें 200 members ही हो सकते हैं, members की एक restriction होती है, प्राइबिट company पे, ठीक है, उसके बाद दूसरे restriction क्या होती है, कि जो private company होती है, वो अपने shares, उसके shares होते हैं, वो freely transfer able नहीं होते, एक shareholder, दूसरे shareholder को easily, यहाँ पर अपने shares को transfer नहीं कर सकता, हमने पहले भी यहाँ पर discuss किया था, ठीक है, कि transfer able नहीं होते, shares जो है, वो transfer able नहीं होते, ठीक है, transfer able नहीं होते, ठीक है, next point देखो हमारा यहाँ पर क्या है, next point, हमारा third यहाँ पर, कि जो private companies होती हैं, वो public से किसी भी तरह का पैसा ले नहीं सकती, मतलब public को invite नहीं कर सकती, कि वो जो है, उसके company के shares buy करें, या फिर debentures buy करें, simple कहने का, कि वो public से किसी भी तरह का fund raise नहीं कर सकती, अगर यह तीन restriction किसी company पर लगी हुई है, तो उसे हम यहाँ पर क्या कहते हैं, private company, पहली restriction कि minimum two members हो, और maximum हमारे यहाँ पर 200 हो, उससे ज़्यादा member हो, दूसरी restriction कि जो उसके shares होंगे, वो easily transfer able नहीं होगे, तीसरी restriction क्या होगी, कि कि यह public से किसी भी तरह का fund raise नहीं कर सकती, clear है, next एक हो क्या है, public company, अब public company क्या होती है, कोई भी ऐसी company जो कि private company नहीं हो, जो private company पर restrictions लगी हुई है, अगर वो restriction किसी company पर नहीं लगी हुई है, तो उसे हम क्या कहेंगे, public company, it means, जो public company है, उसमें minimum की तो हमारी रहती है, 7 members, अगर आपको कोई public company start कर लिया है, तो उस case में आपको 7 members चाहिए, उससे कम हुए तो आप public company नहीं बना सकते, पर maximum की कोई limit नहीं है, आप जितने मरजी members public company में रख सकते हो, दूसरा, इसके जो shares होगे, वो easily transferable होगे, आपको कोई भी यहाँ पर देखने की जरूरत नहीं है, कि किसी consent लेने की जरूरत नहीं है, आप easily यहाँ पर transfer कर सकते हो, शेयर्स, ठीक है, next point देखो क्या है, कि यह public से easily, किसी भी तरह का fund वगैरा raise कर सकती है, I hope आपको इन दोनों के बीच में difference clear हो गया होगा, next point देखो क्या है, government company, अब यह government company क्या होती है, उसके बारे में हम discuss कर लेते हैं, देखो कोई भी company, कोई भी ऐसी company, जिसके जो 51% shares है, वो company ने खरीदे हुए है, sorry, government ने खरीदे हुए है, तो उसे हम यहाँ पर क्या कहते हैं, government company, ठीक है, clear है, मालो यहाँ पर ex-limited company है, और इसके जो 51% shares है, 50 से जाला, वो government ने खरीदे हुए है, जाहें वो यहाँ पर हमारी center government हो ठीक है या फिर हमारी state government हो या फिर दोनों ने मिलकर उस company के 51% share जो है बाए किया है तो उस company को हम यहाँ पर क्या कहते हैं government company clear है आपको clear है पड़ा पड़ से एक बारी मुझे share box में बाता जाएगी कि आपको government company का meaning clear है पड़ा पड़ से बता देगी तो यह हमारी youtube का holding company है अब यह जो google company है वो होल्डिंग company है जिसने इस youtube को hold किया हुआ है जिसके उपर इसका पूरा control है अब इसी के साथ एक subsidiary company को भी हम समझ लेते है subsidiary company जिसके उपर दूसरी company का control होता है अब same example में यहाँ पर जो youtube है उसके उपर इस example में google holding company और जो youtube है वो क्या हमारी subsidiary company clear है आपको next देखो हमारा यहाँ पर types of company on the basis of liability अब liability के basis तो हम companies को कैसे differentiate कर सकते हैं वो भी पता है तो पहला हमारा क्या है company limited by shares अगर कोई company limited by shares है वो उसका मतलब क्या हुआ कि अगर देखो जब भी company अपने आपको incorporate करवाती है तो वहाँ पर company बताती है कि उसके इतने shares होंगे maximum वो जो है इतने shares ही market में जो है issue कर सकती है तो जब वो person company यहाँ पर shares को issue करते है market में और वो person उस share को buy करता है जब से मालो यहाँ पर company ने 10 rupees का एक share buy किया तो यहाँ पर जो company का member है जो बनना चाहता है जो owner बनना चाहता है उसने क्या किया यहाँ पर 10 rupees का एक share buy कर लिया तो यह जो person उसकी liability limited है इस shares के price के साथ ठीक है share के price के साथ कि अगर इसने एक share buy किया तो इसको 10 रुपे यहाँ पर पे करना पड़ेगा तो ऐसी company को हम यहाँ पर क्या कहते है limited by shares ठीक है जिसमें हम member की liability जो है वो decide करते हैं कि कितनी liability होगी according to shares जिसने member ने share purchase किया है उतनी उस person की liability होगी उसे हम कहते है company limited by shares next एक वो क्या है company limited by guarantee अब company limited by guarantee क्या होते है देखो जब company formation हो रही हो थी company बन रही होती है तो यहाँ पर एक person ठीक है एक person जब guarantee देता है कि जब company liquidate होगी तो मैं इतना amount जो है दे दूँगा company को तो वहाँ पर उस member की जो liability होगी उस guarantee एकवल होगी जो उसने दी होगी तो ऐसी company को हम क्या कहते है company limited by guarantee जिसे example यहाँ पर देखो एक person ए था उसने यहाँ पर ए limited company बनाई ठीक है limited यहाँ पर company बनाई और बनाते वक्त इसने कहा था कि यह जो company बंद होगी तो company को मैं यहाँ पर 50,000 रुपीज जो है दे दूँगा मैं इसकी guarantee देता हूँ कि अगर company को पैसे कम पड़े तो 50,000 रुपीज तक मैं पैसे दे दूँगा तो इस member की जो liability है वो limited है किस से उसकी guarantee से जो इसने यहाँ पर guarantee दी है तो ऐसी company को हम यहाँ पर क्या कहते है company limited by guarantee next क्या है company with unlimited liability अब company unlimited liability कोई किसी कोई भी company जिसकी liability unlimited है मतलब उसकी जो members की liability वो unlimited है तो उसे हम यहाँ पर कहते है company with unlimited liability ठीक है और generally यह companies पाई नहीं जाती है बहुत कम पाई जाती है ज़्यादा companies limited ही होती है ठीक है clear है आपको clear है यह हमारे types of companies थी next एको क्या है share capital next जो point है हमारा यहाँ पर share capital है तो फ़ड़ा बट से एक बर मुझे यहाँ तक बता दीजे क्या आपको types of companies clear है ताकि हम share capital यहाँ पर start कर पाएं कि share capital क्या होती है फड़ा बट से बता दीजे तो अब यह share capital देखो क्या होती है जब भी कोई business नई नई बनती है तो उसको काम अपना करने के लिए पैसे की requirement होती है तो companies के अपने company के shares को issue कर दे दिये और उस shares को जब public खरीगती है तो public से वह पैसा जो है raise करती है तो share capital का मतलब क्या होता है वो पैसा जो company ने अपने shares को issue करके raise किया है यहाँ पर तो यहाँ पर देखो जब कंपनी अपने अपने आपको रेजिस्टर करवाती है तो वो कह देती है शुरू में ही कि हम मैक्सिमम इतना ही कैपिटल रेज करेंगे ठीक है हमारा हम कैपिटल जो है इतना ही लेंगे अपने मेंबर से तो उसको अब यह जो कैपिटल है ठीक है यह 50,000 रुपीज होगी, ठीक है, 50,000 रुपीज होगी, अब यह जो company है, उस 50,000 capital को चोटी-चोटी parts में जो है divide कर देती है, जैसे मालो इसने एक part बना दिया यहाँ पर 50,000 का, 10 रुपीज का, ठीक है, 10 रुपीज का, तो यहाँ पर देखो, 50,000 की जो capital थी, उसका आप यहाँ प देखो, इन shares को issue करेगी market में, और public अब इन shares को buy करेगी, ठीक है, 5000 shares को buy करेगी, उसका एक का price कितना है, 10,000, तो company के बास ultimately 50,000 रुपीज जो है, वो आ जाएगी, ठीक है, यह हमारा क्या होता है, यहाँ पर shares, अब company ने यहाँ पर मालो की 5000 shares issue की हैं, और उसको 50,000 रुपे य company shares issue करते हैं, वो दो तरीकी की होती हैं, वो एक equity shares होती हैं, एक preference shares होती हैं, उनके बारे में हम आगे पढ़ेंगे, पर दोनों को issue करके जो total पैसा company ने raise किया होता है, मंगवाया होता है, उसे हम यहाँ पर क्या कहते हैं, share capital, ठीक है, अब एक एक करके हम दोनों shares को समझ लेत हैं, वो एक equity shares होती है, और ज़्यादा risk भी कौन bear करते हैं, equity shares वाले ही करते हैं, तो पहली जी जहांबर देखो क्या है, equity shares को हम ordinary shares या फिर common shares भी कहते हैं, और जो इसके holder होते हैं, वो real owner होते हैं company के, जितना भी risk वगैरा होगा, वो यही bear करते हैं, और ज़्यादा profit भी इन इनों ने ही ज़्यादा risk bear किया है company का, तो इसलिए इनका एक control होता है business पे, इनके पास voting rights होते हैं, कि जब भी कोई company नया काम शुरू करना चाहते हैं, तो यह उसमें vote कर सकते हैं, कि यह काम करना चाहिए या फिर नहीं करना चाहिए, जिसके वज़े से इनका company के working पे पूर नहीं करती है, अगर आपने यहाँ पर company के, मालो shares बाई किये, तो company कभी भी उन shares को वापस नहीं लेगी, lifetime तक, जब तक company यहाँ पर चलेगी, ठीक है, next एक वो क्या है, equity shares holder receive a dividend on the shares, the amount of the dividend depends on the profit made by the company, अब यह जो आपने company के shares बाई कियें, जो investment किये, उसके बदले में company आपक से हैं, dividend किया था, equity shares में क्या मिलता है, हमारा dividend, next के है हमारा preference share, अब यह preference shares क्या होती है, देखो, यह भी company के owner ही होते हैं, इन्होंने भी company के shares बाई किये होते हैं, पर यह क्या होते है, secondary owner होते हैं, मतलब इनके बास ना तो voting rights होते हैं, ना ही इनका business के ऊपर ज्यादा control होता ह उसके बाद इक्विटी शेयर्स वालों को मिलेगा इसलिए आप इसको प्रेफरेंज चीज करते हैं तो वह आगे देखने के पहले यहां पर यहां पर कहा था प्रेफरेंज शेयर्स रिप्रेजेंट ऑनर्शिप इन अकंपनी ये भी कंपनी के ऑनर होते हैं वह बिजनस के secondary owner होते हैं, preference shareholders enjoy the preference over common shareholders in the payment of dividend and capital, मैंने आपको starting में बताता है कि इनको preference shares क्यों कहा जाता है, क्योंकि इनको preference दी जाती है over the equity shares वालों की, पहले इनको pay किया जाएगा, अब वो क्या preference होती है, पहले दो dividend की payment, दूसरी capital की payment, अगर यहाँ पर company को profit हुआ है, तो सबस अगर कोई amount बच जाती है, तो वो equity share वालों को दिया जाएगा, दूसरा क्या है capital की payment, अब किसी company में, अगर company जो है बंद हो रही है, किसी situation में company बंद हो रही है, अब business नहीं चल पा रहा है, तो उस case में, उस case में जो preference share holder वालों, उनको पहले पैसा दिया जाएगा, और equity share holder � अब इस जो preference share holder होते हैं, मिलता तो इनको भी dividend है, पर इनको एक fixed dividend मिलता है, जैसे कि अगर starting में ही fixed कर दिया गया, जैसे बोला की, 10% आपको यहाँ पर dividend दिया जाएगा profit में से, तीके, मतलब कि अगर आपने यहाँ पर मालो, आपने preference shares बाई के, तो starting में बता दे कि आपको स आपने कितने भी time तक, जितना मरजी profit हो जाए, चाहे 1 lakh profit हो जाए, 1 crore हो जाए, आपको तो 1000 ही मिलेगे, पर equity के case में ऐसा नहीं होता है, जितना ज़्यादा profit, उतना ज़्यादा उनका dividend, ठीक है, clear है, तो यह दो तरह के हमारे shares होते हैं, जिनको issue करके share capital जो है, raise की जाती है तो उसके भी हाप पर हमने यहाँ पर types of share capital को पढ़ना है, उसके असाब से हमने समझना है, तो types of share capital में पहली जो type है, वो हमारी क्या है, यहाँ पर authorized capital, अब यह authorized capital क्या होता है, उसके बारे में हम पहले समझते हैं, तो मैंने आपको स्टार्ट में बताया था कि जब company को हम register क तो वो maximum value जो कि आप shares को issue करके raise कर सकते हो, मालो यह हमारी कितनी है, मालो यह हमारी कितनी है यहाँ पर 1 lakh rupees, तो इसका मतलब क्या हुआ कि आप सिर्फ और सिर्फ 1 lakh rupees ही यहाँ पर shares को issue करके raise कर सकते हो, उससे ज़्यादा नहीं, ठीक है, lifetime, lifetime की बात करो, नहीं ऐसा नहीं कि ए क्या होता है अब देखो लाइफ टाइम इसको एक लाथ रुपए मंगवान है अब कंपनी जो है वो एक ही साथ थोड़ी पुरा न पुरा मंगवा लेगी जितना उसको जरूरत होगा उसके इसाब से वो फंडे रेज करेगी तो मालनो यहाँ पर कंपनी को जो है सिर्फ और सिर्फ यहाँ पर 50,000 रुपीज की जरूरत पड़ी है तो यहाँ पर कंपनी ने क्या किया 50,000 के शेयर्स को इशू कर दिया मार्किट में ताकि public उसको खरीद पाए और उससे यहाँ पर हमें पैसा मिले तो इस capital को हम यहाँ पर क्या कहते है issued capital जो company ने share capital यहाँ पर issue किये, clear है उसको हम यहाँ पर यहाँ पर क्या कहते है issued capital next एक उसको क्या है subscribe capital subscribe capital क्या होता है company ने एहाँ पर 50,000 shares की value के यहाँ पर जो है market में issue गया, अब ऐसा थोड़ी है कि public जो है वो सारे के सारे shares ही buy कर ले, ठीक है, यह मतलब subscribe को मतलब जो public shares को buy कर ले थे, ऐसा तो possible नहीं हुआ, तो माल लो कि यहाँ पर जो 40,000 के shares थे, वो यहाँ पर public ने buy कर ले, और बाकी 10,000 के shares हमारे यहाँ पर रहे ग� capital, next एक हो है हमारे यहाँ पर क्या है, called of capital, अब यह called of capital क्या होता है, तो यहाँ पर देखो, जो company होती है, जो हमारी company होती है, generally जब भी वो shares को issue कर दिये, तो वो पैसा जो है installment में मंगवाती है, मतलब कि माल लो आपने क्या कि यहाँ पर company के shares buy किये, एक shares कितना का है, 10 rupees का है उसके बाद मंगवा लिये, उसके बाद 2 rupees और मंगवा लिये, एक मिनट, यहाँ पर लिख देते हैं, माल लो यह 10 rupees में से, company ने क्या किया, 2 rupees पहले मंगवा लिये, फिर 2 rupees मंगवा लिये, उसके बाद 5 rupees और मंगवा लिये, और उसके बाद उसने क्या किया, बाकी के जो तो क shareholder से जितना पैसा मंगवा लिया है उसे हम यहाँ पर कहा रहते हैं called up capital जैसे exa

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