Core और Volatile Deposits: CAIIB BFM के लिए ALM बकेटिंग नियम
हर डिपॉजिट की दो मैच्योरिटी होती हैं — एक वह जो रसीद पर छपी है, और दूसरी वह जो ग्राहक का व्यवहार तय करता है। लायबिलिटी बुक को core और volatile deposits में बाँटना ही वह तरीका है जिससे बैंक इस व्यवहार को एक ऐसे आँकड़े में बदलता है जिसे वह बकेट में डाल सके, फंड कर सके और हेज कर सके। CAIIB BFM के लिए यही एक विचार structural liquidity statement, LCR, NSFR और banking book के interest rate risk — सबको आपस में जोड़ देता है।
🏦 Core और Volatile का असली मतलब
Core deposits डिपॉजिट बेस का वह हिस्सा हैं जो इतिहास गवाह है कि ब्याज दरों की हलचल, मौसमी दबाव या प्रतिस्पर्धी ऑफर — किसी से भी विचलित हुए बिना बैंक के पास टिका रहता है। ये आम तौर पर retail, granular और रिश्ते पर टिके होते हैं — सैलरी अकाउंट, छोटे बचत बैलेंस, और किसी चालू ऑपरेटिंग करंट अकाउंट का वह स्थायी फर्श जो कभी खाली नहीं होता।
Volatile deposits वे बैलेंस हैं जो दाम या भावना बदलते ही तेज़ी से निकल जाते हैं — bulk term deposits, interbank और financial-institution का पैसा, ब्रोकर के ज़रिए आया फंड, और बड़े सिंगल-नेम कॉर्पोरेट बैलेंस।
यह फर्क व्यवहार का है, अनुबंध का नहीं। सेविंग्स डिपॉजिट कानूनी रूप से माँगते ही देय है, फिर भी उसका बड़ा हिस्सा कई वर्षों की फंडिंग जैसा व्यवहार करता है। वहीं एक साल का bulk deposit पहली ही repricing तारीख पर पूरा खिसक सकता है, बशर्ते कोई प्रतिस्पर्धी दो basis point ऊँची बोली लगा दे।
नियामक भी आकार और कीमत के आधार पर यही विभाजन पुख्ता करता है। RBI के नियमों के अनुसार किसी scheduled commercial bank (RRB को छोड़कर) और small finance bank के लिए bulk deposit का अर्थ है ₹3 करोड़ और उससे अधिक का single-rupee term deposit; RRB और local area bank के लिए यह सीमा ₹1 करोड़ है। चूँकि ऐसे डिपॉजिट आक्रामक दरों पर लिए जाते हैं, इसलिए इनका व्यवहार अस्थिर रहता है। फंडिंग और नियामक पहलू वाला चैप्टर pricing और regulation के इन दोनों सिरों को आपस में जोड़ देता है।
💡 Exam Tip: अगर प्रश्न किसी डिपॉजिट को उसकी contractual अवधि से बताए और पूछे कि ALM उसे कैसे मानेगा, तो उत्तर लगभग हमेशा व्यवहार पर टिकता है, अनुबंध पर नहीं।
📊 बैंक दोनों को अलग कैसे करते हैं
Core हिस्सा निकालने का कोई एक तय नियामक फ़ॉर्मूला नहीं है, इसलिए बैंक ALCO से स्वीकृत अपनी लिखित आंतरिक पद्धति अपनाते हैं। व्यवहार में चार तरीके सबसे ज़्यादा चलते हैं, और CAIIB में प्रश्न इनमें से किसी पर भी बन सकता है।
- Minimum balance method: बीते 24 या 36 महीनों में पूल का जो सबसे निचला बैलेंस रहा, उसी फर्श को core मान लें। सरल, रूढ़िवादी और आसानी से ऑडिट होने वाला।
- Statistical volatility method: औसत बैलेंस निकालें और उसमें से दैनिक बैलेंस के standard deviation का एक गुणक घटा दें — आम तौर पर 1.65 या 2.33 deviation, यानी 95% या 99% का फर्श। बचा हुआ हिस्सा volatile माना जाता है।
- Decay या run-off modelling: किसी डिपॉजिट vintage में समय के साथ दिखी वास्तविक attrition पर curve फ़िट करें, उसका half-life निकालें, और बैलेंस को एक ही बिंदु पर डालने के बजाय उसी decay curve पर बाँटें।
- Regression modelling: बैलेंस को policy और market rates से जोड़कर अनुमान लगाएँ कि किसी दिए गए rate shock पर कितना पैसा बाहर चला जाएगा — इसी से deposit beta भी मिल जाता है।
गणित जितना ही ज़रूरी segmentation भी है। बैलेंस को product, ग्राहक के प्रकार, चैनल और ticket size के हिसाब से बाँटा जाता है, क्योंकि ₹15,000 का सैलरी-अकाउंट बैलेंस और ₹40 करोड़ का कॉर्पोरेट करंट अकाउंट एक जैसा व्यवहार नहीं करते।
यही behavioural curves margin planning में इस्तेमाल होने वाले deposit beta और repricing lag को भी चलाती हैं — इसीलिए यह काम डिपॉजिट की लागत और डिपॉजिट प्राइसिंग से अलग नहीं, बल्कि उसके साथ-साथ चलता है।
🧾 Structural Liquidity Statement में स्लॉटिंग
Structural Liquidity Statement ही वह जगह है जहाँ यह वर्गीकरण एक पर्यवेक्षी आँकड़ा बन जाता है। RBI का ALM ढाँचा बैंकों से कहता है कि सभी inflow और outflow तय time buckets में बाँटे जाएँ — अगला दिन, 2–7 दिन, 8–14 दिन, 15–28 दिन, 29 दिन से 3 महीने, 3 से 6 महीने, 6 महीने से 1 वर्ष, 1 से 3 वर्ष, 3 से 5 वर्ष, और 5 वर्ष से अधिक।
Non-maturity deposits की कोई अनुबंधित तारीख होती ही नहीं, इसलिए इन्हें behavioural तर्क पर स्लॉट किया जाता है। Volatile हिस्सा नज़दीकी बकेट में जाता है और core हिस्सा 1 वर्ष से ऊपर वाले लंबे बकेट में। Term deposits residual maturity पर स्लॉट होते हैं, जिसमें देखी गई premature-withdrawal दर और ऐतिहासिक रूप से renew होने वाले हिस्से का समायोजन किया जाता है।
इससे बनने वाले mismatch पर tolerance limits का पहरा रहता है: cumulative negative gap अगले दिन वाले बकेट में cumulative cash outflow के 5% से, 2–7 दिन वाले बकेट में 10% से, 8–14 दिन वाले बकेट में 15% से और 15–28 दिन वाले बकेट में 20% से अधिक नहीं होना चाहिए।
चूँकि core हिस्सा सीधे छोटे बकेट का बोझ हल्का करता है, इसलिए पूरे statement में यही सबसे प्रभावशाली अनुमान है। इसकी कार्यप्रणाली ट्रेजरी प्रबंधन एवं ट्रेजरी उत्पाद का परिचय के साथ चलती है, और मौजूदा निर्देश RBI notifications portal पर प्रकाशित होते हैं।
⚠️ Common Mistake: पूरे सेविंग्स बैंक बैलेंस को 1–14 दिन वाले बकेट में डाल देना। यह रूढ़िवादी नहीं, सीधे-सीधे गलत है: इससे अल्पकालिक outflow बढ़ा-चढ़ाकर दिखता है और gap ratio बिगड़ जाते हैं।
💧 LCR और NSFR इन्हीं डिपॉजिट को कैसे पढ़ते हैं
Basel III बैंक की अपनी राय की जगह तय factors लागू कर देता है। LCR में डिपॉजिट पर 30-दिन के स्ट्रेस वाली run-off दरें लगती हैं; NSFR में उन्हीं डिपॉजिट को Available Stable Funding factor मिलता है। Retail और small-business का पैसा सबसे चिपकने वाला माना जाता है और financial-institution का पैसा सबसे कम टिकाऊ।
RBI के संशोधित LCR निर्देश, जो 1 अप्रैल 2026 से प्रभावी हैं, इंटरनेट और मोबाइल बैंकिंग से जुड़े retail तथा small-business डिपॉजिट पर 2.5 प्रतिशत अंक का run-off add-on लगाते हैं — तर्क यह है कि डिजिटल रूप से पहुँच में रहने वाला पैसा मिनटों में हिल सकता है। कोई retail deposit stable तभी गिना जाता है जब वह पूरी तरह deposit insurance के दायरे में हो और किसी transactional या स्थापित रिश्ते वाले खाते में पड़ा हो; बाकी सब परिभाषा से ही less stable है।
| डिपॉजिट श्रेणी | LCR run-off | NSFR ASF | ALM में core? |
|---|---|---|---|
| Stable retail, इंटरनेट/मोबाइल बैंकिंग नहीं | 5% | 95% | ✅ |
| Stable retail, इंटरनेट/मोबाइल सक्षम | 7.5% | 95% | ✅ |
| Less stable retail (बड़ी राशि, दर-संवेदनशील) | 10%, सक्षम हो तो 12.5% | 90% | आंशिक |
| Operational (clearing, custody, cash management) | 25% | 50% | आंशिक |
| Non-financial corporate या PSE, non-operational | 40% | 50% | ❌ |
| Financial institution और interbank | 100% | 6 महीने से कम पर 0% | ❌ |
वह विषमता ध्यान से देखिए जो अभ्यर्थी अक्सर चूक जाते हैं: कोई डिपॉजिट NSFR के लिए 95% stable हो सकता है और फिर भी LCR में run-off झेल सकता है, क्योंकि दोनों अनुपात अलग-अलग सवालों का जवाब देते हैं — एक 30-दिन का स्ट्रेस, दूसरा एक साल का फंडिंग प्रोफ़ाइल। सिस्टम की तरलता भी व्यवहार बदल देती है, इसीलिए Standing Deposit Facility और liquidity corridor पढ़ना ज़रूरी है।
⚖️ Interest Rate Risk, गवर्नेंस और वैलिडेशन
Core विभाजन सिर्फ़ liquidity का इनपुट नहीं है। Banking book के interest rate risk (IRRBB) में non-maturity deposits ही modelling judgement का सबसे बड़ा स्रोत हैं, क्योंकि लंबी core life मान लेने भर से बैलेंस शीट स्वाभाविक रूप से हेज्ड दिखने लगती है। इसीलिए Basel का standardised approach core मानने योग्य हिस्से और उसकी औसत repricing life — दोनों पर सीमा लगाता है: मोटे तौर पर retail transactional खातों के लिए 90% और पाँच वर्ष, retail non-transactional के लिए 70% और 4.5 वर्ष, तथा wholesale के लिए 50% और चार वर्ष।
गवर्नेंस model-risk की तय किताब पर चलता है: वार्षिक समीक्षा, वास्तविक बैलेंस के विरुद्ध back-testing, बिज़नेस लाइन से बाहर स्वतंत्र validation, ALCO की मंज़ूरी, और यह दिखाने वाला sensitivity analysis कि core हिस्सा दस प्रतिशत अंक गिर जाए तो क्या-क्या टूटता है।
परीक्षा में दो व्यावहारिक सुरक्षा-कवच खास मायने रखते हैं। पहला, deposit concentration — यानी शीर्ष बीस जमाकर्ताओं के पास कितना हिस्सा है — क्योंकि बिखरे हुए ₹500 करोड़ और एक ही जमाकर्ता के ₹500 करोड़ का व्यवहार बिल्कुल अलग होता है। दूसरा, पोर्टल के ज़रिए आए डिजिटल डिपॉजिट, जिनमें उसी आकार के शाखा-स्रोत वाले पैसे की तुलना में कहीं तेज़ attrition दिखती है।
Behavioural liability life सीधे एसेट-साइड के मापों से जुड़ जाती है, जैसे duration और convexity, जबकि valuation का intent trading book बनाम banking book में समझाया गया है। पर्यवेक्षी ढाँचे के लिए बैंकिंग उद्योग में जोखिम विनियमन ज़रूर पढ़ें।
📌 Remember: Core एक अनुमान है, तथ्य नहीं। यह जितनी राहत देता है, उसका हर basis point डेटा से कमाना और स्वतंत्र रूप से validate कराना होता है।
🧠 अभ्यास MCQs: Core और Volatile Deposits
Q1. RRB को छोड़कर किसी scheduled commercial bank के लिए single-rupee term deposit किस राशि और उससे ऊपर bulk deposit कहलाता है? (a) ₹1 करोड़ (b) ₹2 करोड़ (c) ₹3 करोड़ (d) ₹5 करोड़
उत्तर: (c) — SCB और SFB के लिए ₹3 करोड़; RRB तथा local area bank के लिए ₹1 करोड़।
Q2. Structural Liquidity Statement के 8–14 दिन वाले बकेट में cumulative negative gap इससे अधिक नहीं होना चाहिए: (a) 5% (b) 10% (c) 15% (d) cumulative cash outflow का 20%
उत्तर: (c) — पहले चार बकेट की सीढ़ी 5%, 10%, 15% और 20% है।
Q3. एक बैंक core सेविंग्स बैलेंस को दैनिक बैलेंस के औसत में से 1.65 standard deviation घटाकर निकालता है। यह है: (a) decay modelling (b) statistical volatility method (c) minimum balance method (d) contractual slotting
उत्तर: (b) — दैनिक बैलेंस पर confidence-interval की कट-ऑफ़ लगाना ही statistical volatility तरीका है।
Q4. RBI के 1 अप्रैल 2026 से प्रभावी संशोधित LCR मानदंडों के तहत इंटरनेट और मोबाइल बैंकिंग वाले stable retail deposit पर run-off factor कितना लगेगा? (a) 3% (b) 5% (c) 7.5% (d) 10%
उत्तर: (c) — 2.5 प्रतिशत अंक का add-on stable retail श्रेणी को 5% से 7.5% पर ले जाता है।
Q5. कौन-सा डिपॉजिट 1 वर्ष से ऊपर वाले बकेट में जाएगा? (a) 10 दिन में मैच्योर होने वाला interbank deposit (b) सेविंग्स बैलेंस का निकाला गया core हिस्सा (c) अगले हफ़्ते reprice होने वाला bulk deposit (d) किसी financial institution का clearing बैलेंस
उत्तर: (b) — केवल non-maturity deposits का स्थिर core ही लंबे बकेट में जाता है।
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❓ अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
क्या core deposits निकालने का कोई एक निर्धारित फ़ॉर्मूला है?
नहीं। RBI ऐतिहासिक डेटा पर आधारित, लिखित और बोर्ड से स्वीकृत behavioural पद्धति ज़रूर माँगता है, पर कोई एक फ़ॉर्मूला तय नहीं करता। अधिकतर बैंक minimum-balance फर्श या statistical कट-ऑफ़ इस्तेमाल करते हैं और हर साल उसे validate कराते हैं।
क्या करंट अकाउंट बैलेंस को कभी core माना जा सकता है?
हाँ। पेरोल और कलेक्शन के लिए इस्तेमाल होने वाले ऑपरेटिंग करंट अकाउंट में एक स्थिर फर्श बना रहता है जो दीर्घकालिक फंडिंग जैसा व्यवहार करता है। केवल वही फर्श core है; उसके ऊपर की परत volatile ही रहती है।
LCR और Structural Liquidity Statement में core विभाजन किस तरह अलग होता है?
Statement में बैंक RBI के बकेट ढाँचे के भीतर अपने ही behavioural अनुमान लगाता है; LCR 30-दिन के स्ट्रेस पर तय run-off factors लागू करता है। कोई डिपॉजिट आंतरिक रूप से core हो सकता है और फिर भी उस पर run-off लग सकता है।
IRRBB के लिए पर्यवेक्षक core हिस्से पर सीमा क्यों लगाते हैं?
क्योंकि लंबी मानी गई core life आर्थिक मूल्य को वास्तविकता से कम rate-sensitive दिखा देती है। इसीलिए Basel का standardised ढाँचा डिपॉजिट के प्रकार के अनुसार core अनुपात और उसकी औसत परिपक्वता — दोनों पर सीमा तय करता है।
परीक्षा के लिए सब एक साथ
डिपॉजिट का वर्गीकरण कीजिए, विभाजन का औचित्य दीजिए, उसे स्लॉट कीजिए, फिर उसे LCR run-off और NSFR factor से जोड़िए — liabilities पर BFM जो पूछता है, वह लगभग इतना ही है। अभ्यास के लिए CAIIB कोर्स सामग्री देखें और रिवीज़न Bank Financial Management हब से करें।
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